संदेश

बेवजह ज़िंदगी

आज फिर बैठा कुछ सोचने कुछ समझने में, वही पुराना ख्याल और वही सवाल । क्या मकसद है ? क्या वजह ? करना क्या चाहता हूं ? पाना क्या चाहता हूं , खुशबू की तलाश में हूं, महकाना क्या चाहता ? किस चीज की बेचैनी है ? सोचते सोचते थोड़ा आगे बढ़ा तो पाया अब तक क्या-क्या किया और क्यों ? जब से होश संभाला है और जो याद है उनमें सब कुछ किसी ने किसी वजह से था। चाहे पढ़ाई करनी हो क्लास में ठीक से रहना, चाहे लड़ाई झगड़े से दूर जाना हो या जिंदगी को बहुत गंभीर लेना। हर काम के पीछे कुछ ना कुछ वजह रही। फिर भी इनमें से अब क्या बचा है मेरे पास ? कुछ नहीं, यह सब कुछ एक वजह के साथ शुरू हुआ था एक वज़ह के साथ खत्म हुआ। कुछ चीज ऐसी थी जिनके लिए मेरे पास कोई वजह नहीं थी पर वह हमेशा से मेरे पास है। कुछ चीज ऐसी भी है जो मैंने बिना वजह की। किसी वजह से की गई चीज एक वक्त के बाद खत्म हो जाती है। क्योंकि उनकी एक वजह होती है, उनका लक्ष्य होता है और वो पाकर खत्म हो जातीं हैं। उनका क्या जिनका कोई लक्ष्य ही नहीं, जिनका कोई अंत ही नहीं। लिखना मैंने बेवजह ही शुरू किया था और मैं आज भी अक्सर लिखता हूं चाहे नेचर की फोटोस क्लिक करना हो ...

मेरा चांद.....

14/07/20 (Tue) 9:23 PM आज आसमां से मेरा चांद खो गया है, न जाने किस दिशा में जाकर सो गया है। वो जो सांवला सा बड़ा चमकदार तारा था, जो मेरे दिल को बहुत ही ज्यादा प्यारा था। बातों में बहुत कुछ सिखाया उसने, जीने का सही मतलब बताया जिसने। नटखट चांदनी आंखें सब को निहारती थी, मुझे तो रोज़ तोड़कर फिर संवारती थी। उसकी रोशनी में हमने भी लिखना सीखा था, वही तो हमारे जीने का वास्तविक तरीका था। वो जिसने खुशियों का खज़ाना दिया था, मेरी कलम को लिखने का बहाना दिया था। मेरे आसमान में सबसे करीब था वो, उसके होने का एहसास अजीब था वो। हमेशा हर वक्त गतिमान रहता था, सब जानते हुए खुद को अनजान कहता था। हां कुछ दिनों से मंद हुआ जा रहा था, लगता है कि हमसे कुछ कहना चाह रहा था। उसकी चांदनी भी मंद होती जा रही थी, तम की छाया उस पर स्वछंद छा रही थी। मुझे लगा कि मुझसे कोई अटखेली कर रहा है, ये फिर मुझसे कोई ठिठोली कर रहा है। आज अचानक फिर वह कहीं खो गया, उसके बिना आसमान भी सूना हो गया। उसके बाद चांदनी का आना नहीं हुआ तभी से आज हमारा मुस्कुराना नहीं हुआ। तारे तो हैं पर इतने करीब नहीं, शायद उसके जितने हमें अज़ीज़ नहीं। उसके ...

कलम से बात ।

25 May 2020 आज बहुत दिनों बाद कलम फिर हाथ आई है शायद अकेली थी वो भी, इसलिए साथ आई है। मिलते ही पूछा उसने कि कहां व्यस्त थे ? अजीज कहते हो, तो क्यों मुझसे तटस्थ थे। क्या दिन थे वो जब मुझे तुम यार मानते थे पास होती थी तो पूरा संसार मानते थे। सब बताते थे मुझे इतनी अज़ीज़ थी जानती थी सब तुम्हारे इतने करीब थी। साथ हम तो बातें हजार होती थी हां मानती हूं लड़ाई भी एक-आध बार होती थी। पर रूठने मनाने का वह लम्हा यादगार होता था जब यह कोरा पन्ना ही तुम्हारा यार होता था। अपनी जुगलबंदी भी सबको पसंद आने लगी थी जब दिल से निकलकर शायरी स्वच्छंद आने लगी थी। उन शायरियों ने जब बातों का आगाज कर दिया यारों ने तुम्हारा नाम "समझदार" से "आशिकबाज़" कर दिया। उन शायरियों से दोस्तों की फरमाइश पूरी की थी "कुछ अपनी"कहने की ख्वाहिशें पूरी की थी। तो बताओ लेखन का सूरज यूं डूब क्यों गया एक लेखक अपनी लेखनी से ऊब क्यों गया। सुना दो मुझे, अगर सुनने को कोई पास ना हो उन सब की सुनती हूं मैं,जो किसी के खास ना हो। अकेले हो जो इतने, किसी को पता है क्या? इस अकेलेपन में तुम्हारी भी कोई खता है क्या? अच्छ...

कुछ तो है.....

28 May 2020 पेड़ पर एक परिंदा दिखा, बेखौफ,आजाद,और जिंदा दिखा।   नीचे खड़ा आदमी से निहार रहा था, शायद पेट की भूख से हार रहा था।   खुदा का करिश्मा था या परिंदे की खुदाई थी, जब उसने आदमी के लिए दो अम्बियां गिराई थी।   जो देखते ही मैं खुद में परेशान हो गया, परिंदे की इंसानियत देख हैरान हो गया।   ये दोस्ती थी या कोई हिसाब पुराना था, या फिर परिंदे को भी पुण्य कमाना था।   इतना देख मेरे मन ने मुझसे सवाल किया, क्यों परिंदे ने आदमी का ख्याल किया।   इन सवालों का मुझ पर कोई जवाब नहीं था, ऐसा देखने का तो मेरा कभी ख्वाब नहीं था।   एक दिन इंसान इंसानियत भुला देगा, एक छोटा सा परिंदा हमें भलाई सिखला देगा।   जो सोचता था कुछ नहीं है, किसको ? क्या ? दे सकता हूं, आज सोच बदल गई सोचता हूं, किसको, कैसे, कितना दे सकता हूं?   जरूरी नहीं किसी को कुछ दान करना है, बस इतना ठान लो सब का सम्मान करना है।   कुछ तो है, जिसने इंसान को इतना बदहाल किया होगा, परिंदे की सोच को बेमिसाल किया होगा।   कुछ तो है, जो हर वक्त इतना बदलाव करता है, दिन को रात और धूप को छांव करता है...

युवा है तू संधान कर.....

15 June 2020 (10:07 PM) युवा है तू संधान कर , कुछ नया विधान कर, स्वयं को महान कर , लक्ष्य का तू ध्यान कर | परिवार की तू शान बन, समाज का अभिमान बन | क्या लगा है खेल खिलौनों में , तू ऊंचा हैं,ख़ास इन बौनों में, अपनी हस्ती की पहचान कर, युवा है तू संधान कर | संघर्ष में झुकना नहीं , हालात से रुकना नहीं  | सोच समझकर, विचार कर , और वैसा ही आचार कर , दुश्मनों का संहार कर , जीवन से अपने प्यार कर | आज ही तू लक्ष्य ठान , विरोधियों की मत, तू मान, अपनों का सम्मान कर, युवा है तू संधान कर | कह बात सोच विचार कर अब आर कर या पार कर, हुनर को और निखार कर, जा लक्ष्य पर तू मार कर | हाँ मानता हु, हार होगी एक नहीं कई बार होगी , मेहनत ना तेरी बेकार होगी इच्छा तेरी भी साकार होगी| नई सोच रख नया काम कर कुछ अलग तू नाम कर जीतेगा तू भी हार कर युवा है तू संधान कर |

वज़ह

26/04/2023 (11:00 PM) खुली किताब से पन्नें बिखर रहे हैं अब, वह जो उजड़े हुए थे, संवर रहें हैं अब, वो मिलना- बिछड़ना, फिर अलग होने के किस्से, सब जिंदगी के हिस्से बनकर ठहर रहें हैं अब। ना‌ वो आतीं, ना मैं टूटता बिखरता इतना, ना‌ ये पन्ने होते, ना अक्षर उभरता इतना, ना मैं जाता ना उनसे मेरा‌ मिलना होता, ना उनसे बातें होती ना मैं निखरता इतना। उनसे ना बात होती, तो नहीं कोई बात होती, ना तो कलम होती ना ही कोई शुरुआत होती, शुक्र है ! हमें भी ठुकरा दिया उसने, ये लिखना कैसे होता ? अगर वो साथ होती। बस उस एक को कुछ लफ्ज़ बताने को, कितना कुछ सुनाता गया मैं इस ज़माने को, उसकी यादें, बातें और उसका रुठना- मनाना, मैं ये सब लिख रहा हूं सिर्फ उसे भूलाने को।

तो क्या होता....

11/04/2024 कभी कभी सोचता हूं, वो अगर नादान ना होती, तो क्या होता ? वो बहकी बहकी बातों वाली, मेरी निगहबां ना होती, तो क्या होता ? सबको परेशान रखती है वो, मुझे लेकर परेशान ना होती, तो क्या होता ? वो जो इतना सुना लेती है मुझे, अगर मेरी शान ना होती, तो क्या होता ? तेजी से बदलती दुनिया में अगर, ठहरी हुई, वो एक इंसान ना‌ होती, तो क्या होता ?

ऐ ज़िन्दगी.....

11/04/2023 फिर उलझ गई, ऐ ज़िन्दगी, तू सुलझती क्यों नहीं ? मुझे दोष देती है, मुझे समझती क्यों नहीं ? कब तक दूर भागती रहेगी ? ग़मों से एक बार उलझती क्यों नहीं ? मुस्कुराते तो देखा है तुझे, तू एक बार खुलकर हंसती क्यों नहीं ? ऐ ज़िन्दगी ..... ये ग़म भी तेरे हैं, ये खुशियां भी तेरी है, इन्हें तू अपने हिसाब से, रखती क्यों नहीं ?  ऐ ज़िन्दगी .....

बड़े चेहरे ......

10/04/2023 ये लोग बड़े चेहरे रखते हैं। कभी तो भाव हल्के रखते हैं, कभी तो रंग गहरे रखते हैं। कभी मुसाफिर बन जाते हैं, तो कभी अपने डेरे रखते हैं। ये लोग ..... कभी तो खुली किताब जैसे, तो कभी राज़ गहरे रखते हैं। ये लोग ..... जो सच्चे हैं, उन पर ध्यान नहीं देते, जो झूठे हैं, उन्हें ही घेरे रखते हैं। ये लोग ..... कभी उजाले में रहना होता है पसंद, कभी तो चारों ओर अंधेरे रखते हैं। ये लोग ..... दूसरों को बोल देते हैं कुछ भी, अपने कान बहरे रखते हैं। ये लोग .....

अज़ब लोग हैं.....

23/02/2023 अजब लोग हैं, गजब की बात करते हैं, सामने हाथ बढ़ाते हैं, पीछे से घात करते हैं। अपने कल को भूल गए हैं शायद, जो हमारे कल की बात करते हैं। जिनके कारनामों से अतीत भरा है, हमारे सिर उठाने पर वो सवालात करते हैं। क्या खूब हुनर है आज, हर एक शख्स के पास, हर शख्स से अलग चेहरे में मुलाकात करते हैं। झूठ तो ऐसे कहते हैं आजकल लोग, जैसे सावन में बादल बरसात करते हैं। हर झूठ की भूमिका में वो शख्स निकलेगा, जिसकी यादों में अक्सर आप रात करते हैं। समझ नहीं आया, क्या शिकायत हैं लोगों को ? जो खुद ही दूसरों के हाथ अपने जज़्बात करते हैं।