बेवजह ज़िंदगी
आज फिर बैठा कुछ सोचने कुछ समझने में, वही पुराना ख्याल और वही सवाल । क्या मकसद है ? क्या वजह ? करना क्या चाहता हूं ? पाना क्या चाहता हूं , खुशबू की तलाश में हूं, महकाना क्या चाहता ? किस चीज की बेचैनी है ? सोचते सोचते थोड़ा आगे बढ़ा तो पाया अब तक क्या-क्या किया और क्यों ? जब से होश संभाला है और जो याद है उनमें सब कुछ किसी ने किसी वजह से था। चाहे पढ़ाई करनी हो क्लास में ठीक से रहना, चाहे लड़ाई झगड़े से दूर जाना हो या जिंदगी को बहुत गंभीर लेना। हर काम के पीछे कुछ ना कुछ वजह रही। फिर भी इनमें से अब क्या बचा है मेरे पास ? कुछ नहीं, यह सब कुछ एक वजह के साथ शुरू हुआ था एक वज़ह के साथ खत्म हुआ। कुछ चीज ऐसी थी जिनके लिए मेरे पास कोई वजह नहीं थी पर वह हमेशा से मेरे पास है। कुछ चीज ऐसी भी है जो मैंने बिना वजह की। किसी वजह से की गई चीज एक वक्त के बाद खत्म हो जाती है। क्योंकि उनकी एक वजह होती है, उनका लक्ष्य होता है और वो पाकर खत्म हो जातीं हैं। उनका क्या जिनका कोई लक्ष्य ही नहीं, जिनका कोई अंत ही नहीं। लिखना मैंने बेवजह ही शुरू किया था और मैं आज भी अक्सर लिखता हूं चाहे नेचर की फोटोस क्लिक करना हो ...