ऐ ज़िन्दगी.....

11/04/2023
फिर उलझ गई,
ऐ ज़िन्दगी, तू सुलझती क्यों नहीं ?
मुझे दोष देती है,
मुझे समझती क्यों नहीं ?

कब तक दूर भागती रहेगी ?
ग़मों से एक बार उलझती क्यों नहीं ?
मुस्कुराते तो देखा है तुझे,
तू एक बार खुलकर हंसती क्यों नहीं ?
ऐ ज़िन्दगी .....

ये ग़म भी तेरे हैं, ये खुशियां भी तेरी है,
इन्हें तू अपने हिसाब से, रखती क्यों नहीं ? 
ऐ ज़िन्दगी .....

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