कुछ तो है.....

28 May 2020

पेड़ पर एक परिंदा दिखा,
बेखौफ,आजाद,और जिंदा दिखा।
 
नीचे खड़ा आदमी से निहार रहा था,
शायद पेट की भूख से हार रहा था।
 
खुदा का करिश्मा था या परिंदे की खुदाई थी,
जब उसने आदमी के लिए दो अम्बियां गिराई थी।
 
जो देखते ही मैं खुद में परेशान हो गया,
परिंदे की इंसानियत देख हैरान हो गया।
 
ये दोस्ती थी या कोई हिसाब पुराना था,
या फिर परिंदे को भी पुण्य कमाना था।
 
इतना देख मेरे मन ने मुझसे सवाल किया,
क्यों परिंदे ने आदमी का ख्याल किया।
 
इन सवालों का मुझ पर कोई जवाब नहीं था,
ऐसा देखने का तो मेरा कभी ख्वाब नहीं था।
 
एक दिन इंसान इंसानियत भुला देगा,
एक छोटा सा परिंदा हमें भलाई सिखला देगा।
 
जो सोचता था कुछ नहीं है,
किसको ? क्या ? दे सकता हूं,
आज सोच बदल गई सोचता हूं,
किसको, कैसे, कितना दे सकता हूं?
 
जरूरी नहीं किसी को कुछ दान करना है,
बस इतना ठान लो सब का सम्मान करना है।
 
कुछ तो है,
जिसने इंसान को इतना बदहाल किया होगा,
परिंदे की सोच को बेमिसाल किया होगा।
 
कुछ तो है,
जो हर वक्त इतना बदलाव करता है,
दिन को रात और धूप को छांव करता है।
 
कुछ तो है जो सब कुछ बनाकर तोड़ता होगा,
शायद वो सब को एक ही धागे से जोड़ता होगा।

कुछ तो है जो हर किसी में मौजूद रहता है,
हर खुशी में उसका ही वजूद रहता है।
 
कुछ तो है जिसे आज तक कोई जान नहीं सका,
मूर्ख इंसान तो खुद को भी पहचान नहीं सका।
 
कुछ नहीं इंसान का, सब बस रोना होता है,
नाम रह जाता है बाकी सब खोना होता है।
 
तू निशब्द होकर अर्थों को ढूंढता है,
तू मूढ़ है या फिर ये तेरी मूढ़ता है।

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