वज़ह

26/04/2023 (11:00 PM)
खुली किताब से पन्नें बिखर रहे हैं अब,
वह जो उजड़े हुए थे, संवर रहें हैं अब,
वो मिलना- बिछड़ना, फिर अलग होने के किस्से,
सब जिंदगी के हिस्से बनकर ठहर रहें हैं अब।


ना‌ वो आतीं, ना मैं टूटता बिखरता इतना,
ना‌ ये पन्ने होते, ना अक्षर उभरता इतना,
ना मैं जाता ना उनसे मेरा‌ मिलना होता,
ना उनसे बातें होती ना मैं निखरता इतना।


उनसे ना बात होती, तो नहीं कोई बात होती,
ना तो कलम होती ना ही कोई शुरुआत होती,
शुक्र है ! हमें भी ठुकरा दिया उसने,
ये लिखना कैसे होता ? अगर वो साथ होती।


बस उस एक को कुछ लफ्ज़ बताने को,
कितना कुछ सुनाता गया मैं इस ज़माने को,
उसकी यादें, बातें और उसका रुठना- मनाना,
मैं ये सब लिख रहा हूं सिर्फ उसे भूलाने को।

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