कलम से बात ।
25 May 2020
आज बहुत दिनों बाद कलम फिर हाथ आई है
शायद अकेली थी वो भी, इसलिए साथ आई है।
मिलते ही पूछा उसने कि कहां व्यस्त थे ?
अजीज कहते हो, तो क्यों मुझसे तटस्थ थे।
क्या दिन थे वो जब मुझे तुम यार मानते थे
पास होती थी तो पूरा संसार मानते थे।
सब बताते थे मुझे इतनी अज़ीज़ थी
जानती थी सब तुम्हारे इतने करीब थी।
साथ हम तो बातें हजार होती थी
हां मानती हूं लड़ाई भी एक-आध बार होती थी।
पर रूठने मनाने का वह लम्हा यादगार होता था
जब यह कोरा पन्ना ही तुम्हारा यार होता था।
अपनी जुगलबंदी भी सबको पसंद आने लगी थी
जब दिल से निकलकर शायरी स्वच्छंद आने लगी थी।
उन शायरियों ने जब बातों का आगाज कर दिया
यारों ने तुम्हारा नाम "समझदार" से "आशिकबाज़" कर दिया।
उन शायरियों से दोस्तों की फरमाइश पूरी की थी "कुछ अपनी"कहने की ख्वाहिशें पूरी की थी।
तो बताओ लेखन का सूरज यूं डूब क्यों गया
एक लेखक अपनी लेखनी से ऊब क्यों गया।
सुना दो मुझे, अगर सुनने को कोई पास ना हो
उन सब की सुनती हूं मैं,जो किसी के खास ना हो।
अकेले हो जो इतने, किसी को पता है क्या?
इस अकेलेपन में तुम्हारी भी कोई खता है क्या?
अच्छा ये बताओ,वक्त नहीं होता या बातें नहीं होती
किस वजह से शायरियों की शुरुआत नहीं होती।
(इतना सुनते ही मन में एक भूडोल उठा,
बस तुरंत मैं भी सब कुछ बोल उठा।)
बस कर यार आज क्यों इतना बोल रही है
कुछ रहने भी दे क्यों सारे पन्ने खोल रही है।
हां मानता हूं,कुछ वक्त थोड़ा दूर हो गया था
अपने वक्त और हालात से मजबूर हो गया था।
रही बात शायरी की वह तो दिल का मामला है
क्या करें ?दिल से पन्नों तक का लंबा फासला है।
एक बात है कि तू बड़ी समझदार है
मान गया तू मेरी सच्ची यार है।
क्योंकि जो भी बात थी तूने जाहिर कर दिया
बात करने को मेरे दोस्त को हाजिर कर दिया।
वरना कुछ लोग तो बिना बताए भी रूठ जाते हैं फिर उन्हें सोचते हुए हम भी टूट जाते हैं।
कोई बात नहीं जो हुआ भूल जाते हैं
चलो फिर से कुछ कोरे-पन्ने जुटाते हैं।
रही बात जो बातें करने की,
तो कई बातें याद आ जाती है।
याद तो आती है पर फिर,
जिम्मेदारियां भी आगे आ जाती है।
घर का बड़ा बेटा हूं,
तो सोच समझ कर चलता हूं।
पीढ़ियां सुधर जाएंगे मेरी
अगर मैं कुछ कर गुजरता हूं।
फिर यार ने बताया खुद्दारी भी जरूरी है
पर उसे छोड़ दूं,ऐसी भी क्या मजबूरी है ?
चाहने वाले बहुत है उसके पेड़ की छांव जैसी है
दुखों के इस सागर में खुशियों की नाव जैसी है।
जिद पर आऊंगा कभी तो जमाना बदल दूंगा
बात करने के लिए, फिर बहाना बदल लूंगा।
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