संदेश

मन है.....

जो है सब तेरा, तेरे हाथ रखना चाहता हूं, मैं अब तुझमें खोने से, थोड़ा बचना चाहता हूं। मुश्किल है तुझे भूलाना, कुछ मदद चाहिए, बिन बताए की, मोहब्बत के सबक चाहिए। अब दो तरफ के रास्तों को समझना नहीं है, मुझे अब और ज्यादा, ज़िन्दगी से उलझना नहीं है। अब घर के नवाब का, कुछ ख्वाहिश का मन है, उन दोस्तों के सरकार का, फरमाइश़ का मन है। मन है, थोड़ा ख़ुद से ख़ुश रहा जाए, क्यों किसी के भरोसे पे दु:ख सहा जाए। मन है, बेवजह फिर मुस्कुरा दूं मैं, ख़ुद में ख़ुदा को मिलूं, तुझे भूला दूं मैं। मन है, हवा- सा बहता हूं, आसमां - सा ठहर जाऊं। मन है, इतना जो संवरा हूं, टूट कर फिर बिखर जाऊं। मन है, ये दुनिया है,  दुनिया में खेल- खिलौने हैं, इस दुनिया से ही खेलूं, और दुनिया को खेल खिला जाऊं। मन है कि मैं बेफिक्र रहूं, क्यों चिंता चिता बने मेरी जो मुझे इतना जानती है, ये कलम ही सखा बने मेरी। मन है कि कम बोलूं, और ज़्यादा कुछ समझा जाऊं, तुम कौन हो ? इस बारे में, सब कुछ तुम्हें बता जाऊं। मन है, तुमसे जो कहना है, कहूं और अपने घर जाऊं, डर है कि तुमसे निकल कहीं, घर के रस्ते में ना मर जाऊं। मन है, थोड़ा सा बहक चलूं क...

आखिरी दिन

11 मई 2022 मन हो रहा है कुछ रचा जाए आज, उन रातों के सपनों से मिला जाए आज। जिसे लगता है वह जानता है मुझे उससे कुछ अनकहा-सा कहा जाए आज उल्फतें तो जिंदगी का हिस्सा ही रहीं इन उलझनों के ऊपर चला जाए आज बुलाओ महफिल जिम्मेदारों की ज़रा सब के दुख को कहा और सुना जाए आज। वो जो वक्त गुजारे थे साथ में कभी उन यादों का जाल कोई बुना जाए आज ये जो जिंदगी ने हमें दिए हैं ये दर्द इस दर्द को तसल्ली से सहा जाए आज मैं तो कहता हूं, छोड़ो महानता की बातें आओ नदी के साथ बहा जाए आज ये जो उसने तोहफे में दिया है हमें, इस दिन को आखरी की तरह जिया जाए आज।

उन्मुक्त

ये मेरी नींद बगावत कर रही है, वो मेरी शिकायत कर रही है। सुनकर हंस पड़ा खुदा भी, वो बद्दुआ में भी इनायत कर रही है। बड़ी उलझन में लगते हो, कुछ कहना चाहते हो ? मुझे बता ही दो अगर, आपे में रहना चाहते हो। वो चांद जिसे मैं बेहद चाहता था, उसकी चाहत में कोई कमी नहीं आई। पानी बरसा, खुशबू फूटी, पर कुछ पेड़ों में अब भी नमी नहीं आई। बहुत झेला है इसने, भली बातें कर रहा है। दिल की दरारों से होकर, उजाला बिखर रहा है। बड़े मुश्किल हालातों में हूं, मैं ये कैसे जज़्बातों में हूं। सबकी सुनें जा रहा हूं, और अपनी ही बातों में हूं। खुदा करे तो वो करें, जो मैं कहूं वो सो करें। बड़ा अकेला अकेला-सा लगता है, ये दुनिया नहीं मेला-सा लगता है। सब कहते हैं तुम्हारे लिए ही तो है, मगर उसके लिए धातु का ढेला-सा‌ लगता है। हर रात घर से एक दुआ निकलती है, उस गांव के उस घर पर ठहरती है, जिसकी मुंडेर पर बैठी है मोहतरमा, उनकी जुल्फ़ बिन हवा के ही लहरती है। अजीब वक्त है, वक्त से गुजर जाता है, जब भी अच्छा हो नजरों से उतर जाता है। खुदा के वास्ते, खुद को भूल मत जाना, तुम यादों में आना पर याद मत आना।

वो मुझे बुलाती है।

~ 10 फ़रवरी 2021 वो दूर कहीं एक दीप्त- लौ लहर-लहर लहराती है, वो मुझे बुलाती है - 2 अनंत आकाश ने एक पुंज देखा, वो ऊर्जा अस्तित्व पाना चाहती है। वो मुझे बुलाती है -2 मन के अंदर की एक बुढ़ी सी याद कोई, दिन पे दिन जवान होती आती है। वो मुझे बुलाती है -2 सर्व -व्याप्त जो प्रकृति है, वही जो मुझे बनाती है। वो मुझे बुलाती है -2 कुछ तो कारण है जो हवा, नित मुझे जगाती है। न जगा जो हवाओं से तो, किरणें भी जगाने आती है । जागते ही मेरे कोयलें भी गीत गाती हैं। वो सब मुझे बुलाती है -2 निरर्थक नहीं हूं मैं,यह सब वही जताती है। वो जो मेरे अस्तित्व को छद्म भर बताती है। वो किसे बुलाती है, वो किसे बुलाती है। ~ राहुल

ख़ुशी

ख़ुशी   ख़ुशी नाम है एक एहसास का , और मेरे किसी एक ख़ास का।   इस एहसास और उस ख़ास में, मेरे लिए कोई फ़रक नहीं, दोनों ही पसंद हैं मुझे, दोनों पे मेरा हक़ नहीं।   आना और जाना, तो फ़ितरत है इनकी। इसलिए मुझे इनसे कोई कसक नहीं।   कुछ यादें छोड़ जाती हैं , ये दोनों ही अक्सर। जिनकी बेताबी की, किसी को भी भनक नहीं।   हिस्से में हैं जिसके उसमे शादाबी आती है, रूठ जाएँ जो किसी से तो बहुत बेताबी आती है।   बड़े बदनसीब हो, अगर जो तुमसे दूर हैं ये। हम जैसे पागलो में, बहुत बड़ा सुरूर हैं ये।   पास हो तो गुजरता वक़्त महसूस नहीं होता, जब दूर हो जाएँ जिंदगी ठहराव इत्तिला करती हैं।   फूलों की खुशबू से जैसी वफ़ा होती हैं, उसे याद भर करने में बड़ी शिफ़ा होती है।   जब वो राह में टकरा जाये, तब ख़ुशी होती है।   जब खुद मे बे-खुदी हो जाये, तो ख़ुशी होती हैं। कोई बेवकूफी सी बात हो, तो ख़ुशी होती है।   उदास चेहरे पे मुस्कान ला दे, वो खुशी होती है। अंतस को बाहर बुला दे, वो वजह  ख़ुशी होती है। हठी...

धुंध कुछ छंट रही है......

धुंध कुछ छंट रही है, ये दुनिया बंट रही है मनुजता तार-तार होकर भी जीवन खट रही है। समीपता की तकनीक, सामीप्य से ही हट रही है। धर्म पर हठ-दृढ़ता से धर्मता ही कट रही है, धुंध कुछ छंट रही है, ये दुनिया बंट रही है।   वो जो गुनाह होते देख लिया था मैंने, उसकी परछाई आके मुझसे सट रही है।   लक्ष्मी के डांटने से सरस्वती डट रहीं हैं, कलिका स्वयं महाकाल से निपट रहीं हैं।   वो जो चन्दन है उससे सर्पणी लिपट रही है, सदैव इतिहास-समझ की समस्या विकट रही है। प्रकृति की वेदना मनुष्य पर पलट रही है, मनुष्य बढ़ गए और मनुष्यता घट रही है। देखो, मेरी आंखों की पुतलियां सिमट रहीं हैं, धुंध कुछ छंट रही है ये दुनिया बंट रही है।

जवानी में हूं।

समझना चाहते हो मैं कितनी परेशानी में हूँ, इतना समझ लो मैं जिंदगी की जवानी में हूँ।   यहाँ जवान होना खुद में एक मसअला है, जो विचारों का धनी वो अर्थ का कंगला है, जो देश का भविष्य है, उसका कोई भविष्य नहीं, आज जैसे दृश्य हैं, कल का कोई परिदृश्य नहीं।   समाज चाहता है विश्व - जीत बन जाये, परिवार की उम्मीद, घर का दीप बन जाये।   स्वयं चाहता है, कोई इसका मीत बन जाये, तब भी उम्मीद है, जिदगी संगीत बन जाये। बचपन से इसके लिए ढांचा बनाया गया, जो इसमें ढल गया वो ही अपनाया गया। पहले तो कहा गया अंक-संग्रहण करो, नौकरी मांगी तो कहा शिक्षा-ग्रहण करो।   ज्ञान प्राप्त कर पहुंचे, तो "तुम नहीं अब लायक हो", बालक है उत्तीर्ण वही जिसके पिता विधायक हों।   अब तुम ही बताओ, पिता को विधायक कैसे बनाऊं ? अब तो भला इसी में, मैं बैठकर चरखा चलाऊं।   कुछ समय चला, फिर इसका भी उद्धार हुआ, उद्योग आये, हुनर का अन्त्येष्टी संस्कार हुआ।   इतने पर भी अगर हक़ की बात उठाई, चलेगा शासन का डंडा, मिलेगी पिटाई।   अब बताओ ? घर का बड़ा हूँ, ऊप...

ताल की सत्ता

  ताल की सत्ता बैठे हैं दो भेक, एक ताल में कमल पर, एक वाक्-प्रवीणता पर दूसरा बुद्धि-बल पर।   लगता हैं उन्हें, उनके सिवा, ताल में कोई नहीं, टक्कर जो दे सके उन्हें, इस काल में कोई नहीं।   देखी जो ऊंचाई तो, अहंकारवश काफिर हुए, अनसुना करने लगे, मानो की वो बाधिर हुए।   उनपे आते छींटों का लक्ष्य वो बदल देते, खुद के आघात को तालाब पर उढ़ल देते।   व्यवहार ऐसा की, अन्य जीवो से भंग हैं, भूल गये, कमल सहित ताल के ही अंग हैं।   वसंत का है काल, कमल ताल का द्योतक है, परन्तु इनकी मुर्खता का दृश्य अतीव रोचक है।   हुआ विस्मित जब मैंने एक कोलाहल देखा, ताल के जीवों में एकजूट-सा हलचल देखा।   बड़ी मछलियों ने कमल पर कीचड़ उछाला, सोचा था की भार से गिरेगा कमल मतवाला।   दोनों इस षड्यंत्र की सूचना जब पाते हैं, इस आघात को, ताल पर हमला बताते हैं।   इसी मध्य वर्षा ने यूँ हस्तक्षेप किया, मानो प्रकृति इस द्वंद पर आक्षेप किया।   खबर हुई अम्लीय-वर्षा से जीव मर रहें हैं, कुछ सिहर गये है, तो कुछ कूच कर रहे ह...

वेदना

हृदय की ये वेदना अब नहीं संभलती है, चिंतन की ये वेदना हमें आकर छलती है। ऐसी वेदना शिव हुई ना हलाहल-पान से, वो वेदना उठी थी जो सकती के देह-दान से।   वो वेदना संभली नहीं जो स्वयं महाकाल से, राम की वो वेदना, रावण मिलाया काल से।   देख क्रोंञ्च का विलाप महर्षि मुख प्रस्फुटित हुई, मानो जैसे टकरा मही से, शिला कोई द्रवित हुई।   वो जिसने कर्ण को साहस और था बल दिया, वासुदेव के विरुद्ध सूतपुत्र को संबल दिया।   सिद्धार्थ की वो वेदना, जिसने धरा को बुद्ध दिया शुद्र की वो वेदना, बौद्ध धर्म प्रबुद्ध किया।   द्रोपदी की वेदना, कुरुक्षेत्र के युद्ध हुए, पराजय की वेदना से कृष्ण-भीष्म से क्रुद्ध हुए।   रावण की वो वेदना, रुदन तत्व उत्पन्न हुआ, अनादि महादेव का शिव स्त्रोत संपन्न हुआ।   पार्वती की वेदना, पुतले में जीवन डाला, जग को मिला उसका विघ्न हरने वाला।   माता की वो वेदना अखंड-सत्य खंड किया, पुत्र मोह से विवश हो विनाश-प्रचंड किया।   इतिहास साक्षी है, वेदना ने जब पुकार की, कुछ नश्वर रचा है प्रकृति ने संस...

अंतस संवाद

बाहर से मैं सुना सुनाया गीत सुन रहा था, अंतस में कोई जो संगीत बून रहा था।   मैंने बढ़कर पूछ लिया,रे कोन है ?क्या चाहता है ? मेरा अंतस है क्या ? जो तू फुसफुसाता है। मेरा अंतस में क्या कोई और रहता है ? देखता कुछ हूं, वो कुछ और कहता है। कोई ईश्वर बुलाता है कोई दृष्टिकोण कहता है, कोई सर्वस्व तो कोई मुझे बस गौण कहता है। मुझसे मनुज है ! मनुज का अंतस नहीं मैं, मैं स्वयं लक्ष्य हूँ, कोई तरकस नहीं मैं।   मैं वो धर्म हूँ जिसे महर्षि धार चुके हैं, विश्व के कुछ लोभी मुझे भी मार चुके हैं।   सभी वो देखते हैं जो दिखाना चाहता हूँ, मुझे जो देख सके, बस वो दीवाना चाहता हूँ।   स्नेह से पाया मुझे तो मैंने भी उद्धार किया, हठ किया मुझसे तो मैने फिर संहार किया।   मानव को संस्कृति और संस्कार दिए मैंने, उपनिषद, पुराण और वेद-चार दिया मैंने।   तूने जिन्हें सुना-पढ़ा वो मुझसे ही मिले थे, मेरे चुने हुए थे फूल जो सभी खिले थे।   मैं आदि से हूँ और अंत तक रहूँगा, अध्यात्म हूँ ! धरा से भगवंत तक रहूँगा। लगा मुझे, मन उपहास कर रहा है, उदा...