अंतस संवाद

बाहर से मैं सुना सुनाया गीत सुन रहा था,

अंतस में कोई जो संगीत बून रहा था।

 

मैंने बढ़कर पूछ लिया,रे कोन है ?क्या चाहता है ?

मेरा अंतस है क्या ? जो तू फुसफुसाता है।


मेरा अंतस में क्या कोई और रहता है ?

देखता कुछ हूं, वो कुछ और कहता है।


कोई ईश्वर बुलाता है कोई दृष्टिकोण कहता है,

कोई सर्वस्व तो कोई मुझे बस गौण कहता है।


मुझसे मनुज है ! मनुज का अंतस नहीं मैं,

मैं स्वयं लक्ष्य हूँ, कोई तरकस नहीं मैं।

 

मैं वो धर्म हूँ जिसे महर्षि धार चुके हैं,

विश्व के कुछ लोभी मुझे भी मार चुके हैं।

 

सभी वो देखते हैं जो दिखाना चाहता हूँ,

मुझे जो देख सके, बस वो दीवाना चाहता हूँ।

 

स्नेह से पाया मुझे तो मैंने भी उद्धार किया,

हठ किया मुझसे तो मैने फिर संहार किया।

 

मानव को संस्कृति और संस्कार दिए मैंने,

उपनिषद, पुराण और वेद-चार दिया मैंने।

 

तूने जिन्हें सुना-पढ़ा वो मुझसे ही मिले थे,

मेरे चुने हुए थे फूल जो सभी खिले थे।

 

मैं आदि से हूँ और अंत तक रहूँगा,

अध्यात्म हूँ ! धरा से भगवंत तक रहूँगा।


लगा मुझे, मन उपहास कर रहा है,

उदास हूँ, इसलिए हास-परिहास कर रहा हैं।

 

मेरे मस्तिष्क में जैसे ही ये विचार आया,

उसने रोका मुझे, और  फिर फ़रमाया। 


सभी के सर्व विचारों का संञ्चेता हूँ मैं,

तेरे इस तुच्छ विचार का भीं प्रणेता हूँ मैं।

 

मत रख संशय, मैं तुझमे होकर भी जुदा हूँ,

मैं ज्ञानियों के चित्त की ज्ञान की क्षुधा है।

 

जा पूछ ज्ञानियों से, ज्ञान कहाँ से उत्पन्न हुआ ?

वो बतायेंगे तुझे वो अंतस में संपन्न हुआ‌।

 

चाहता हैं मुझे तो स्वयं की तलाश कर,

मैं वहीँ मिलूँगा एकत्व के समास पर।

 

मैं जगा झुन्झुन्लाकर रे कौन है ?क्या कहता है ?

तब समझा मैं, अंतस अंतस में ही रहता हैं ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मन है.....

वेदना

ख़ुशी