मन है.....
जो है सब तेरा, तेरे हाथ रखना चाहता हूं,
मैं अब तुझमें खोने से, थोड़ा बचना चाहता हूं।
मुश्किल है तुझे भूलाना, कुछ मदद चाहिए,
बिन बताए की, मोहब्बत के सबक चाहिए।
अब दो तरफ के रास्तों को समझना नहीं है,
मुझे अब और ज्यादा, ज़िन्दगी से उलझना नहीं है।
अब घर के नवाब का, कुछ ख्वाहिश का मन है,
उन दोस्तों के सरकार का, फरमाइश़ का मन है।
मन है, थोड़ा ख़ुद से ख़ुश रहा जाए,
क्यों किसी के भरोसे पे दु:ख सहा जाए।
मन है, बेवजह फिर मुस्कुरा दूं मैं,
ख़ुद में ख़ुदा को मिलूं, तुझे भूला दूं मैं।
मन है,
हवा- सा बहता हूं,
आसमां - सा ठहर जाऊं।
मन है,
इतना जो संवरा हूं,
टूट कर फिर बिखर जाऊं।
मन है, ये दुनिया है,
दुनिया में खेल- खिलौने हैं,
इस दुनिया से ही खेलूं,
और दुनिया को खेल खिला जाऊं।
मन है कि मैं बेफिक्र रहूं, क्यों चिंता चिता बने मेरी
जो मुझे इतना जानती है, ये कलम ही सखा बने मेरी।
मन है कि कम बोलूं, और ज़्यादा कुछ समझा जाऊं,
तुम कौन हो ? इस बारे में, सब कुछ तुम्हें बता जाऊं।
मन है, तुमसे जो कहना है, कहूं और अपने घर जाऊं,
डर है कि तुमसे निकल कहीं, घर के रस्ते में ना मर जाऊं।
मन है, थोड़ा सा बहक चलूं किसी नई राह मंज़िल की तरफ,
सब खोने से तो बेहतर है बढ़ चलूं किसी हासिल की तरफ।
टिप्पणियाँ