वेदना

हृदय की ये वेदना अब नहीं संभलती है,

चिंतन की ये वेदना हमें आकर छलती है।


ऐसी वेदना शिव हुई ना हलाहल-पान से,

वो वेदना उठी थी जो सकती के देह-दान से।

 

वो वेदना संभली नहीं जो स्वयं महाकाल से,

राम की वो वेदना, रावण मिलाया काल से।

 

देख क्रोंञ्च का विलाप महर्षि मुख प्रस्फुटित हुई,

मानो जैसे टकरा मही से, शिला कोई द्रवित हुई।

 

वो जिसने कर्ण को साहस और था बल दिया,

वासुदेव के विरुद्ध सूतपुत्र को संबल दिया।

 

सिद्धार्थ की वो वेदना, जिसने धरा को बुद्ध दिया

शुद्र की वो वेदना, बौद्ध धर्म प्रबुद्ध किया।

 

द्रोपदी की वेदना, कुरुक्षेत्र के युद्ध हुए,

पराजय की वेदना से कृष्ण-भीष्म से क्रुद्ध हुए।

 

रावण की वो वेदना, रुदन तत्व उत्पन्न हुआ,

अनादि महादेव का शिव स्त्रोत संपन्न हुआ।

 

पार्वती की वेदना, पुतले में जीवन डाला,

जग को मिला उसका विघ्न हरने वाला।

 

माता की वो वेदना अखंड-सत्य खंड किया,

पुत्र मोह से विवश हो विनाश-प्रचंड किया।

 

इतिहास साक्षी है, वेदना ने जब पुकार की,

कुछ नश्वर रचा है प्रकृति ने संसार की।

 

जब जब वेदना ने स्वयं का विस्तार किया,

तब तब कर्मतत्व ने नूतन अविष्कार किया ।

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