ताल की सत्ता

 ताल की सत्ता

बैठे हैं दो भेक, एक ताल में कमल पर,

एक वाक्-प्रवीणता पर दूसरा बुद्धि-बल पर।

 

लगता हैं उन्हें, उनके सिवा, ताल में कोई नहीं,

टक्कर जो दे सके उन्हें, इस काल में कोई नहीं।

 

देखी जो ऊंचाई तो, अहंकारवश काफिर हुए,

अनसुना करने लगे, मानो की वो बाधिर हुए।

 

उनपे आते छींटों का लक्ष्य वो बदल देते,

खुद के आघात को तालाब पर उढ़ल देते।

 

व्यवहार ऐसा की, अन्य जीवो से भंग हैं,

भूल गये, कमल सहित ताल के ही अंग हैं।

 

वसंत का है काल, कमल ताल का द्योतक है,

परन्तु इनकी मुर्खता का दृश्य अतीव रोचक है।

 

हुआ विस्मित जब मैंने एक कोलाहल देखा,

ताल के जीवों में एकजूट-सा हलचल देखा।

 

बड़ी मछलियों ने कमल पर कीचड़ उछाला,

सोचा था की भार से गिरेगा कमल मतवाला।

 

दोनों इस षड्यंत्र की सूचना जब पाते हैं,

इस आघात को, ताल पर हमला बताते हैं।

 

इसी मध्य वर्षा ने यूँ हस्तक्षेप किया,

मानो प्रकृति इस द्वंद पर आक्षेप किया।

 

खबर हुई अम्लीय-वर्षा से जीव मर रहें हैं,

कुछ सिहर गये है, तो कुछ कूच कर रहे हैं।

 

आदेश हुआ सभी जीव ताल में समाँ गये,

बहुत विनाश हुआ फिर वैद्य-नाथ बचा गये।

 

फिर भी सत्ता की दौड़ अनवरत जारी है,

समझ गया "राहुल", ये नूतन महामारी है।

 

दोष किसका है ये कहना भी भारी है,

एक पक्ष द्वेषयुक्त दूसरा अहंकारी है।


समझ जाओ सत्ता नहीं है, ये नूतन महामारी है।   (~ Rahul.K) 

Insta :- Rahul_k309


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