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धुंध कुछ छंट रही है......

धुंध कुछ छंट रही है, ये दुनिया बंट रही है मनुजता तार-तार होकर भी जीवन खट रही है। समीपता की तकनीक, सामीप्य से ही हट रही है। धर्म पर हठ-दृढ़ता से धर्मता ही कट रही है, धुंध कुछ छंट रही है, ये दुनिया बंट रही है।   वो जो गुनाह होते देख लिया था मैंने, उसकी परछाई आके मुझसे सट रही है।   लक्ष्मी के डांटने से सरस्वती डट रहीं हैं, कलिका स्वयं महाकाल से निपट रहीं हैं।   वो जो चन्दन है उससे सर्पणी लिपट रही है, सदैव इतिहास-समझ की समस्या विकट रही है। प्रकृति की वेदना मनुष्य पर पलट रही है, मनुष्य बढ़ गए और मनुष्यता घट रही है। देखो, मेरी आंखों की पुतलियां सिमट रहीं हैं, धुंध कुछ छंट रही है ये दुनिया बंट रही है।

जवानी में हूं।

समझना चाहते हो मैं कितनी परेशानी में हूँ, इतना समझ लो मैं जिंदगी की जवानी में हूँ।   यहाँ जवान होना खुद में एक मसअला है, जो विचारों का धनी वो अर्थ का कंगला है, जो देश का भविष्य है, उसका कोई भविष्य नहीं, आज जैसे दृश्य हैं, कल का कोई परिदृश्य नहीं।   समाज चाहता है विश्व - जीत बन जाये, परिवार की उम्मीद, घर का दीप बन जाये।   स्वयं चाहता है, कोई इसका मीत बन जाये, तब भी उम्मीद है, जिदगी संगीत बन जाये। बचपन से इसके लिए ढांचा बनाया गया, जो इसमें ढल गया वो ही अपनाया गया। पहले तो कहा गया अंक-संग्रहण करो, नौकरी मांगी तो कहा शिक्षा-ग्रहण करो।   ज्ञान प्राप्त कर पहुंचे, तो "तुम नहीं अब लायक हो", बालक है उत्तीर्ण वही जिसके पिता विधायक हों।   अब तुम ही बताओ, पिता को विधायक कैसे बनाऊं ? अब तो भला इसी में, मैं बैठकर चरखा चलाऊं।   कुछ समय चला, फिर इसका भी उद्धार हुआ, उद्योग आये, हुनर का अन्त्येष्टी संस्कार हुआ।   इतने पर भी अगर हक़ की बात उठाई, चलेगा शासन का डंडा, मिलेगी पिटाई।   अब बताओ ? घर का बड़ा हूँ, ऊप...

ताल की सत्ता

  ताल की सत्ता बैठे हैं दो भेक, एक ताल में कमल पर, एक वाक्-प्रवीणता पर दूसरा बुद्धि-बल पर।   लगता हैं उन्हें, उनके सिवा, ताल में कोई नहीं, टक्कर जो दे सके उन्हें, इस काल में कोई नहीं।   देखी जो ऊंचाई तो, अहंकारवश काफिर हुए, अनसुना करने लगे, मानो की वो बाधिर हुए।   उनपे आते छींटों का लक्ष्य वो बदल देते, खुद के आघात को तालाब पर उढ़ल देते।   व्यवहार ऐसा की, अन्य जीवो से भंग हैं, भूल गये, कमल सहित ताल के ही अंग हैं।   वसंत का है काल, कमल ताल का द्योतक है, परन्तु इनकी मुर्खता का दृश्य अतीव रोचक है।   हुआ विस्मित जब मैंने एक कोलाहल देखा, ताल के जीवों में एकजूट-सा हलचल देखा।   बड़ी मछलियों ने कमल पर कीचड़ उछाला, सोचा था की भार से गिरेगा कमल मतवाला।   दोनों इस षड्यंत्र की सूचना जब पाते हैं, इस आघात को, ताल पर हमला बताते हैं।   इसी मध्य वर्षा ने यूँ हस्तक्षेप किया, मानो प्रकृति इस द्वंद पर आक्षेप किया।   खबर हुई अम्लीय-वर्षा से जीव मर रहें हैं, कुछ सिहर गये है, तो कुछ कूच कर रहे ह...

वेदना

हृदय की ये वेदना अब नहीं संभलती है, चिंतन की ये वेदना हमें आकर छलती है। ऐसी वेदना शिव हुई ना हलाहल-पान से, वो वेदना उठी थी जो सकती के देह-दान से।   वो वेदना संभली नहीं जो स्वयं महाकाल से, राम की वो वेदना, रावण मिलाया काल से।   देख क्रोंञ्च का विलाप महर्षि मुख प्रस्फुटित हुई, मानो जैसे टकरा मही से, शिला कोई द्रवित हुई।   वो जिसने कर्ण को साहस और था बल दिया, वासुदेव के विरुद्ध सूतपुत्र को संबल दिया।   सिद्धार्थ की वो वेदना, जिसने धरा को बुद्ध दिया शुद्र की वो वेदना, बौद्ध धर्म प्रबुद्ध किया।   द्रोपदी की वेदना, कुरुक्षेत्र के युद्ध हुए, पराजय की वेदना से कृष्ण-भीष्म से क्रुद्ध हुए।   रावण की वो वेदना, रुदन तत्व उत्पन्न हुआ, अनादि महादेव का शिव स्त्रोत संपन्न हुआ।   पार्वती की वेदना, पुतले में जीवन डाला, जग को मिला उसका विघ्न हरने वाला।   माता की वो वेदना अखंड-सत्य खंड किया, पुत्र मोह से विवश हो विनाश-प्रचंड किया।   इतिहास साक्षी है, वेदना ने जब पुकार की, कुछ नश्वर रचा है प्रकृति ने संस...

अंतस संवाद

बाहर से मैं सुना सुनाया गीत सुन रहा था, अंतस में कोई जो संगीत बून रहा था।   मैंने बढ़कर पूछ लिया,रे कोन है ?क्या चाहता है ? मेरा अंतस है क्या ? जो तू फुसफुसाता है। मेरा अंतस में क्या कोई और रहता है ? देखता कुछ हूं, वो कुछ और कहता है। कोई ईश्वर बुलाता है कोई दृष्टिकोण कहता है, कोई सर्वस्व तो कोई मुझे बस गौण कहता है। मुझसे मनुज है ! मनुज का अंतस नहीं मैं, मैं स्वयं लक्ष्य हूँ, कोई तरकस नहीं मैं।   मैं वो धर्म हूँ जिसे महर्षि धार चुके हैं, विश्व के कुछ लोभी मुझे भी मार चुके हैं।   सभी वो देखते हैं जो दिखाना चाहता हूँ, मुझे जो देख सके, बस वो दीवाना चाहता हूँ।   स्नेह से पाया मुझे तो मैंने भी उद्धार किया, हठ किया मुझसे तो मैने फिर संहार किया।   मानव को संस्कृति और संस्कार दिए मैंने, उपनिषद, पुराण और वेद-चार दिया मैंने।   तूने जिन्हें सुना-पढ़ा वो मुझसे ही मिले थे, मेरे चुने हुए थे फूल जो सभी खिले थे।   मैं आदि से हूँ और अंत तक रहूँगा, अध्यात्म हूँ ! धरा से भगवंत तक रहूँगा। लगा मुझे, मन उपहास कर रहा है, उदा...

कलम नई पर बात वही।

13 July 2020 Note: यह लेख  29 जून 2020 को लिखा गया है। कृपया इसे वर्तमान संदर्भ से ना जोड़े। नमस्ते दोस्तों मैं राहुल स्नातक का छात्र हूं। शायद आप मुझे कम या ज्यादा जानते होंगे तो सबसे पहले कोई गलती हो तो माफ कीजिएगा आज मैं अपने कुछ विचार रखूंगा। तो शुरू करते हैं "कलम नई पर बात वही" तो बात कल दोपहर की है उस टाइम वेस्ट शेड्यूल के बीच यूट्यूब पर एक गाना सुना " Shukar Kar "  जो गाना वैसे था तो लॉकडाउन के हालात पर, पर उसने मेरे दिमाग के कई ढक्कन खोल दिए जिसमें गाने से ज्यादा उससे पहले और उसके बाद मेरे साथ हुई घटनाओं का योगदान था। तो बात करते हैं लोक डाउन की । लॉक डाउन का टाइम वह टाइम जिसे सबने अपने हिसाब से इस्तेमाल किया और उसी हिसाब से टिप्पणियां भी की। जिसके फायदे के रूप में दिखा उसने हमें बहुत वक्त दिया वह सभी काम करने के लिए जो हम सोचते थे कभी वक्त मिलेगा तो करेंगे। मैंने भी बहुत से नए काम किए जिनमें से एक था "over thinking" थोड़ा बेवकूफी भरा है पर मुझे तो पसंद है तो मैंने किया। विषय भी बहुत सारे थे धीरे-धीरे मैं वास्तविक विषय पर आया बल्कि यूं कहूं कि ...