धुंध कुछ छंट रही है......
धुंध कुछ छंट रही है, ये दुनिया बंट रही है मनुजता तार-तार होकर भी जीवन खट रही है। समीपता की तकनीक, सामीप्य से ही हट रही है। धर्म पर हठ-दृढ़ता से धर्मता ही कट रही है, धुंध कुछ छंट रही है, ये दुनिया बंट रही है। वो जो गुनाह होते देख लिया था मैंने, उसकी परछाई आके मुझसे सट रही है। लक्ष्मी के डांटने से सरस्वती डट रहीं हैं, कलिका स्वयं महाकाल से निपट रहीं हैं। वो जो चन्दन है उससे सर्पणी लिपट रही है, सदैव इतिहास-समझ की समस्या विकट रही है। प्रकृति की वेदना मनुष्य पर पलट रही है, मनुष्य बढ़ गए और मनुष्यता घट रही है। देखो, मेरी आंखों की पुतलियां सिमट रहीं हैं, धुंध कुछ छंट रही है ये दुनिया बंट रही है।