जिंदगी - जीने का नाम है (3)
खाना खाने के बाद रोहित कमरे से बाहर आया बाहर सबको लूडो खेलता देख उसने पूछा
"बड़े मजे हो रहे हैं स्कूल नहीं गए आज ?"
"नहीं आज तो सेकंड सैटरडे है तो छुट्टी है।" रुद्रांश ने रोहित को देखते हुए कहा
(रुद्रांश रोहित का छोटा भाई )
फिर सबसे छोटी रिया ने कहा
"भैया आओ आप भी खेलो ना हमारे साथ"
"तुम खेलो मैं थोड़ा धूप लेने छत पर जा रहा हूं।"
अपने एअरबड्स लगाता हुआ रोहित सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।
छत पर कुर्सी लगाए बैठा रोहित बड़े आराम से गाने सुन रहा था तभी उसका फोन बजा। रोहित ने बड्स से ही कॉल पिक किया।
"हेलो"
"हां भाई कैसे हो ?" सामने से रोहित के साथ पहले काम करने वाले शुभम की आवाज आई। (शुभम एक 22 साल का सीधा समझदार लड़का जो सिर्फ काम से काम रहता है बहुत कम बात करने वाला होते हुए भी जिससे उसकी अच्छी दोस्ती हो गई थी।)
"मैं बढ़िया भाई और बताओ क्या चल रहा है ?" रोहित ने आवाज पहचानते हुए कहा
"बस वही रोज का काम, मैंने सुना आपने जॉब छोड़ दी।"
"जी हां"
"क्यों ? क्या हुआ ? कोई बात हुई क्या ?
"नहीं कुछ खास नहीं"
"तो फिर ?"
"बस थोड़ा टाइमिंग का समस्या थी। रोज घर पर डांट सुननी पड़ती थी।"
"हां टाइम की दिक्कत तो रहती है इस फिल्ड में"
"हां, बस इतना ही कुछ खास नहीं"
"तो अब क्या करोगे ?"
"दूसरी कोई जॉब ढूंढ लूंगा।"
"भाई मैंने आपको पहले ही बताया था मार्केट में कहीं जॉब नहीं है मैं खुद 6 महीने तक बैठा रहा फिर आखिर यही आ गया।"
"कोई बात नहीं, हम भी थोड़ा भटक लेते हैं फिर आ जाएंगे।" रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा
"भाई जल्दी जॉब देख लो वरना बिना जॉब के तो काफी समस्या हो जाएगी।"
"समस्या तो होगी, उसका भी उपाय निकाल लेंगे।"
"चलो ठीक है मैं काम पूरा कर लूं, कुछ टाइम में सब टेली लेने आ जाएंगे।"
"हां ठीक है" कहते हुए रोहित ने फोन कट कर दिया फिर नीचे आकर वह सब के साथ खेलने लगा । अगले दो दिन शनिवार और रविवार काफी अच्छे से सबके साथ हंसते खेलते कब निकल गए रोहित को पता ही नहीं चला।
सोमवार की सुबह रोहित सुबह 5:00 बजे उठ गया। जैसा कि उसकी आदत थी फिर वह रनिंग के लिए चला गया फिर 6:00 बजे घर आते ही उसने देखा पापा टॉवल ढूंढ रहे हैं। तो उसने कमरे से लाकर टॉवल उन्हें दिया
"अरे रोहित! तूने फिर जॉब छोड़ दी ?"
सुमित ने कहा ( सुमित एक सर्विस बेस्ड कंपनी में हेल्पर का काम करते हैं और काम में व्यस्तता और दूरी होने के कारण से उनका घर पर रहना कम ही होता है।)
"जी पापा, आपको पसंद नहीं था तो छोड़ दिया।" रोहित ने उदास आवाज में कहा
"पसंद की बात नहीं है बेटे, मैंने उस फिल्ड में काम किया है इसलिए मुझे पता है वहां कोई वक्त तय नहीं होता।"
"हां वो तो है" रोहित ने समझते हुए कहा
"तो अब क्या करना है कुछ सोचा ?"
"जी बस जॉब देख रहा हूं।"
"अच्छा वह मास्टर्स डिग्री के लिए एडमिशन फॉर्म भर दिया।"
"जी उसकी तो परीक्षा भी हो गई बस परिणाम का इंतजार है।"
"अच्छा ! चलो ठीक है मुझे देर हो रही है मैं जा रहा हूं नहाने" सुमित बाथरूम की ओर बढ़ गए
"जी पापा" कहते हुए रोहित अपने कमरे में चला गया।
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