जिंदगी - जीने का नाम है (1)

एक लड़का कुछ परेशान अपने आप से बातें करते हुए चलते-चलते एक पार्क में पहुंचा और एक टेबल पर बैठा। सब अपने कामों में व्यस्त थे तभी तंदुरुस्त से बुजुर्ग हांफते हुए उसके बगल में आ बैठे। शाम का वक्त दोनों लाल पड़े आसमान को देखने लगे।
तभी बुजुर्ग ने कहा "ऑफिस से आ रहे हो बेटा ? "
यह सुनते ही रोहित हड़बड़ा गया उसने कहा "जी अंकल आपने कुछ कहा ? "
"मैंने पूछा ऑफिस से आ रहे हो ?"
"जी"
"परेशान लगते हो क्या हुआ है ?"
"जी नहीं ऐसे ही"
"65 साल का हूं बेटा अनुभव हो गया है लोगों को पढ़ने का"
"चलो यही बता दो कैसा गया दिन" ये बोलकर तो जैसे उन्होंने रोहित की भावनाओं को हवा दे दी हो। रोहित ने आज तक कई दोस्त बनाए थे पर उनमें कोई ऐसा नहीं था जो उससे यह सवाल कर सकें।
"अच्छा ही था ।" एक उदास आवाज के साथ।
"ओह्ह ! सब ठीक था इसलिए तुम अपना बैग उठाए ऑफिस से सीधा पार्क चले आए। मुझसे झूठ बोल रहे हो ?"
रोहित ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया बस उदासी में गर्दन झुकाए हुए बैठा रहा।
"अगर चाहो तो तुम मुझे अपनी परेशानी बता सकते हो क्या पता मैं कुछ मदद कर सकूं ?"

अब रोहित को उनकी सांत्वना भरी बातों से चिड़चिड़ाहट हो रही थी।उसने तेज आवाज में कहा "जब मेरे अपनों को मेरी लाइफ में इंटरेस्ट नहीं है तो आप क्यों इतना इंटरेस्ट ले रहे हो ? आप जाइए मुझे अकेला छोड़ दीजिए प्लीज 
यह सुनते ही उन बुजुर्ग उठते हुए कहा - 
"ओके रिलैक्स! मैं चलता हूं तुम अपना ध्यान रखना। फिर मिलेंगे !"
और वो मुस्कुराते हुए चले गए।
रोहित टेबल पर दोबारा अकेला था धीरे-धीरे सब अपने-अपने घर चले गए। सर्दियों का समय सन-सन करती ठंडी हवा, हल्की- हल्की धुंध और उसमें पड़ती झिमी फुहार, हिलते पेड़ों से गिरते हुए पत्ते, सन्नाटे से आती रेवुओं की आवाज, पार्क में लगी स्ट्रीट लाइट से आती मंदम रोशनी में रोहित, अकेला गुमसुम-सा कुछ सोचता हुआ बैठा था। तभी एक आवाज आई - "भइया ! टाइम हो गया, अब आपको भी जाना चाहिए।"
ये पार्क की रखवाली करने वाला गार्ड था।
उसकी आवाज सुनकर रोहित की तंद्रा टूटी तो उसने घड़ी देखी जो 11:00 बजा रही थी। वह उठा और बस स्टैंड की ओर बढ़ गया। रात के 11:00 बजे रोहित अकेला बस स्टैंड पर बस का इंतजार कर रहा था। अचानक एक कार बस स्टैंड के सामने आकर रुकी। रोहित घबरा गया, तभी कार का शीशा खुला और अंदर बैठे आदमी ने पूछा - "तुम्हें घर छोड़ दूं बहुत रात हो गई है।"
"आप तो वही है जो पार्क में मिले थे।" रोहित ने हैरान होते हुए कहा।
"हां"
रोहित सोचने लगा तभी उन्होंने कहा-
"डरो नहीं चाहो तो घर पर बता दो किसी को।"
"मेरा फोन बंद हो गया है। " रोहित ने बताया
"तो लो, मेरा फोन इस्तेमाल कर लो।" अपना फोन आगे बढ़ाते हुए
"हेलो मम्मी"
"रोहित, रोहित कहां है बेटा ? सब कब से परेशान हो रहे हैं और फोन क्यों स्विच ऑफ कर रखा है। एक बार बता तो दिया कर अगर देर होती है तो….." सामने से घबराई आवाज में रोहित की मम्मी बोलने लगी तभी बात काटते हुए रोहित ने कहा
"मैं ठीक हूं और घर आ रहा हूं मैं जिनके साथ हूं ये उन्हीं का नंबर है अच्छा ठीक है मैं पहुंचता हूं।"
गाड़ी में बैठकर "Thanks again for help" "कोई बात नहीं, चलो ड्राइवर।
गाड़ी रोड़ पर भागने लगी और गाड़ी के अंदर खामोशी पसरी थी। तभी रोहित ने कहा- 
"I am Sorry for That time."
"कोई बात नहीं, अच्छा तुम अब अच्छा महसूस कर रहे हो ?
"जी, वो बस उस वक्त थोड़ा परेशान था तो…"
"कोई बात नहीं, घर जाओ आराम करो। इस उम्र में यह सब आम बात है।"
"जी, मेरा घर आ गया बस इसी अपार्टमेंट के सामने रोक दीजिए।" 
"थैंक्यू अंकल जी" गाड़ी से उतरते हुए रोहित ने कहा।
"वेलकम बेटा! ये लो मेरा कार्ड जब भी जरूरत पड़े याद कर सकते हो ।
"जी जरूर , थैंक यू अगेन आपसे मिलकर अच्छा लगा।"
"मुझे भी, रात काफी हो गई है जाओ आराम करो चलो ड्राइवर"
गाड़ी आगे बढ़ गई।


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