02/01/2023

हर एक ग़म एक नया ग़म बना रहा है,
हमें उसके बिना चैन कैसे आ रहा है ?

वो था, तो भी उखड़ा-उखड़ा रहता था,
आज ना होकर भी हमें क्यों भरमा रहा है ?

कभी देखा था एक चांद, अमावस की रात में,
वही चांद है, आज पूनम पर नजर आ रहा है।

हमें तो क्या लेना इस चांद और चांदनी से,
पर इसका ख्याल क्यों बार-बार सता रहा है।

ये हेर-फेर, ये ख़्यालों के बवंडर,
कोई बताओ ये खेल कौन खिला रहा है।

मैं नहीं हूं,‌ ये मेरा कोई ग़म है,
जो मेरे ही जज़्बात मुझे बता रहा है।

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