कुछ अपनी - 3

 हेलो फ्रेंड्स,मैं अंकित और आगे की अपनी इस कहानी को मैं आप तक पहुचाऊंगा।

अब तक की कहानी में हमने देखा कि कैसे मेरी कॉलेज लाइफ एक अच्छे अनुभव के साथ शुरु हुई और अब मुझे एक ऐसी समस्या का सामना करना है जो मेरी पूरी कॉलेज लाइफ को प्रभावित कर सकती है।

तो वो समस्या मेरे सामने एक सहपाठी महेश कुमार के रूप में आयी जो एक गुरुकुल से पढ़े हुए विद्वान थे। परन्तु कुछ ग़लतफ़हमियों के कारण हम दोनों में कटुता आ गयी थी जिसके कारण मैं काफ़ी परेशान हो गया था। यह समस्या इतनी बढ़ गयी कि मैंने कॉलेज बदलने का भी प्रयास किया परन्तु अधिक ज्ञान ना होने के कारण असफल रहा पर अचानक दो हफ़्तों के बाद मुझे पता चला कि मिथिलेश भाई ने कॉलेज बदल लिया है और उसका कारण मैं नहीं। बल्कि वह यहाँ की शिक्षण पद्धति से संतुष्ट नहीं थे इसलिए उन्होंने ऐसा किया।

और इन्ही सब के बीच विभाग द्वारा नए छात्रों के स्वागत स्वरुप एक आयोजन किया गया- "फ्रेशर्स पार्टी"। इस उत्सव में विभाग के तीनो वर्षों के विद्यार्थी उपस्थित थे और प्रथम वर्ष के विद्यार्थियों के लिए विशेष टास्क नियोजित किये गये थे जिसमे प्रत्येक विद्यार्थी को मंच पर जाकर अपना सामान्य परिचय देना होता था तत्पश्चात अपने चुने गये टास्क को पूर्ण करना होता था। जब मेरी बारी आयी तो मैंने अपने सम्पूर्ण प्रयास से अपना सामान्य परिचय तो दे दिया परन्तु टास्क के रूप में मुझे एक ऐसा कार्य मिला था जो उससे पहले मैं कभी सोच भी नहीं सकता था -"कपल डांस"। मैंने आज से पूर्व कभी अकेले में भी अकेले डांस नहीं किया था। और उससे बढ़कर कि आज पहली बार मैंने मंच से कुछ कहा था। परन्तु यहाँ बात आत्मसम्मान की थी तो बड़े सहमे हुए अंदाज में मैंने अपने सहयोगी की मांग की  मुझे बताया गया की मेरी ही कक्षा में एक छात्र है जो मेरी मदद कर सकता है। उसका नाम करन हैं। उसे बुलाया गया वो भी मेरी ही तरह दुबला-पतला परन्तु कद में मुझसे तनिक छोटा था। उसके आने के बाद मैंने उससे अपनी परेशानी बताई-

"हेलो भाई, यार मैं आपको बता दू कि मैंने आज से पहले कभी डांस नहीं किया है।"

"कभी भी नहीं ?" वो चौकते हुए बोला।

"नहीं" मैंने काफ़ी सहमी आवाज़ में कहाँ।

"कोई बात नहीं आप बस बॉडी ढीली रखना और जैसे-जैसे मैं करूँ वैसे-वैसे करना,  बाकी मैं संभाल लूंगा।"

"ठीक है।"

हम मंच पर गये और उसने ऐसा डांस स्टार्ट किया जैसा की आजतक मैंने सिर्फ इंग्लिश मूवीज में वोइलिन पे होते देखा था। पर पुरे डांस के दौरान मैं उसके बातों पे ही ध्यान दे रहा था। और हमारा डांस खतम हुआ तो मैंने उसे काफ़ी कृतघ्नता के साथ धन्यवाद किया। उसने आज मेरी आत्मसम्मान बचाने में मदद की थी। और मैं उसके आत्मविश्वास से काफ़ी प्रभावित हुआ था।क्योंकि हमारे डांस के दौरान हम पर बहुत से बच्चे हस रहे थे पर उसने उनका रत्तिभर भी असर स्वयं पर नहीं होने दिया। उसके बाद मैंने पाया कि उस दिन मेरा मंच का डर काफ़ी कम हो चुका था।      

उसके बाद का दौर कब और कैसे गुजरा इसका मुझे भान ही नहीं हुआ। इस दौर में मैंने बहुत से हीरे-मोती इकट्ठा कर लिए थे। जिनमे से दो मेरे बहुत ज्यादा करीब थे हम तीनो साथ में खाते, पढ़ते, घूमते और घर जाते थे। ये दोनों थे – आदित्य और गोपाल। जैसे लगता था ये दोनों मेरे ही आधे-आधे हिस्से हैं क्योंकि ये दोनों मिलकर मुझे पूरा करते थे मैं एक तरफ जहाँ पढ़ने का शौक़ीन था वही दूसरी तरफ मस्ती करना मेरी कमजोरी थी और इन दोनों ही गुणों को ये दोनों अपने अन्दर समाये हुए थे। एक तरफ जहाँ पढ़ाई और प्रयोजना कार्य में मेरी मदद आदित्य करता था, वहीं दूसरी तरफ नयी चीजों और सामाजिक कार्यो में गोपाल प्रेरित करता था। तो इस तरह इन दोनों से मिलकर ही मैं पूरा होता था। मुझे नहीं मालूम की ये मेरे साथ क्यों रहते थे पर हाँ ये दोनों ही ऐसे थे जो मेरी बातों को बिना कहे समझ सकते थे।

अब सब सही चल रहा था सभी कक्षाएं नियमित रूप से होने लगी और मैं अपनी अंग्रजी की कक्षा से परेशान होना शुरू कर चुका था (जो की मैंने वैकल्पिक विषय के रूप में चुनी थी)। क्योंकि उस विषय की अध्यापिका जी केवल अंग्रेजी माध्यम से ही बात करती थी और मुझे उसका अभ्यास नही था। तभी इन कक्षाओं के मध्य मैं विवेक भाई से मिला जो मिथिलेश के साथ ही गुरुकुल से पढ़ कर आये थे और उन्होंने मेरे ही समान अंग्रेजी विषय का चयन किया था। फिर कुछ समय बाद पूरे महाविद्यालय का माहौल बदल गया क्योंकि महाविद्यालय स्तर के चुनाव आ गये थे इस समय में हमारी कक्षा से देवाशीष मीना (जो की नेता बनना चाहता था ) बहुत सक्रीय दिखा।

इसी कड़ी में मैं अपने बहुत से मित्रों से मिला मयंक, रामकिशन, प्रवीण, अंकुश, हंसराज, लवकुश राघव, करन शाहा, करन और मेरे अन्य सहपाठी।

कुछ समय बाद ‌एक दौर ऐसा भी आया जब मुझे फिर लगने लगा कि मैं अकेला पड़ रहा हूँ। वो समय था कॉलेज फेस्ट का। जो की हर कॉलेज में एक निश्चित समय में होता था कॉलेज की विभिन्न सोसाइटीज़ अपने अपने सदस्यों के हुनर का प्रदर्शन करती थी। इन उत्सवों की तैयारी प्रारंभ हुई और गोपाल हमारे संस्कृत विभाग के कार्यों में एक स्वयंसेवक के रूप में सेवा देने लगा और उसी समय आदित्य अपने घर यानी चित्रकूट उत्तरप्रदेश चला गया था। ऐसे समय में मैंने अपने तीसरे मित्र यानी तकनीक का सहारा लिया। बचपन से मैं तकनीकी विज्ञान में काफ़ी रूचि रखता था।

तो इसी बीच मैं एक और ऐसे ही दोस्त से मिला जो तकनीक को काफ़ी अच्छी तरह समझता और उपयोग करता था उसका नाम था - मयंक। मयंक भी मेरी ही कक्षा में पढ़ता था और हम पहले भी मिल चुके थे पर हमें एक दुसरे की इस खूबी के बारे में नहीं पता था। हम दोनों ही खाली समय में किसी कमरे में बैठ कर तकनीक को नए तरीकों से चलाना सीखते थे। तभी मेरे इस हुनर से अवगत एक मित्र हमसे जुड़ा, वो मित्र था - प्रवीण। प्रवीण मेरी ही तरह नेतृत्व प्रवृत्ति का बच्चा था। वो हमारे विभाग के मुख्य कार्यो में सहयोग देता था, और लगभग सभी मुख्य लोगो के साथ संपर्क में था। फिर हमने मिलकर विभागोत्सव की छोटी-सी झांकी बनायीं थी। और धीरे-धीरे प्रवीण मुझे विभाग के छोटे-मोटे कार्यों में भी साथ ले जाने लगा। तो फिर इस तरह हम सभी मित्रों ने मिलकर महोत्सव को काफी अच्छे से मनाया और हमने एक साथ काफ़ी यादें बनायीं।

कॉलेज महोत्सव के ख़त्म होते ही हम सभी आने वाली परीक्षाओं की तैयारी और प्रयोजना कार्यों में लग गये और फिर परीक्षाएं आ गयी। हमने काफ़ी अच्छे से परीक्षाएं दी और परीक्षाओं के बाद हमारा छमाही अंतराल प्रारंभ हुआ। हमारी आखिरी परीक्षा 13 दिसम्बर को थी और अब कॉलेज दोबारा 8 जनवरी से आरम्भ होना था। बस इसी तरह से मेरा फर्स्ट सेमस्टर बीत गया।

और इन छुट्टियों को मैंने मस्ती करते हुए गुजारा।आगे मेरे जीवन में फिर एक ऐसी घटना घटी जिसकी मुझे कोई आशंका नहीं थी कि ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है। क्योंकि मेरे जीवन में एक ख़ुशी आने वाली थी। ये कहानी फिर कभी जानेंगे 

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