कुछ अपनी- 2
हेलो फ्रेंड्स, कल हमने देखा कैसे अंकित को जब कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। तो उसे एक अंकल जी मिले जो उसके साथ एक रिक्शे में बैठ कर चल दिए हैं। तो क्या अंकल जी उसे सही रास्ता बताएँगे या बात कुछ और ही है आखिर एक राह चलते व्यक्ति ने उसकी मदद क्यों की ?
रिक्शे के चलते ही एक सन्नाटा छा गया। तभी इस चुप्पी को तोड़ते हुये अंकल जी बोले- "बेटा आपने वहां नया दाखिला लिया है ?"
"जी !"
"बेटा, मेरा नाम कमल है और ये मेरा मोबाइल न. , मलका गंज में मेरी एक छोटी सी किराने की दूकान है और कुछ कमरे भी हैं जिन्हें हम किराए पर देते हैं। कोई लेना चाहे तो बताना।"
"जी जरूर"
"अच्छा ! चलो आगे से आपको रिक्शा बदलना है। आ जाओ इस रिक्शे में बैठो।"
"भैया इन्हें हंसराज कॉलेज पे उतार देना।" उन्होंने रिक्शेवाले से कहा।
"और बेटा ! आपको यहाँ कोई भी समस्या हो आप मुझे बे-झिझक कॉल कर सकते हो।"
"थैंक यू ! अंकल जी" कहते हुए अंकित रिक्शे में बैठ गया।
और अंकल जी मुस्कुराते हुए एक गली की ओर चल पड़े।
और फिर इस रिक्शे ने भी रफ़्तार भरी एक ऐसी गली होते हुए जहाँ तूफ़ान से पहले की शान्ति बरपी थी। ये बिलकुल वैसा ही दृश्य था जैसा की फ़िल्मों में हड़ताल के समय दिखाया जाता है पर ये सब अंकित को धुंधला-सा दिखाई दे रहा था।क्योंकि उसका दिमाग उन अंकल जी के बारे में सोचने में लगा था जिन्होंने उसकी इतनी मदद की थी। और इस तरह अंकित ने अपना पहला संपर्क बना लिया। इस छोटी सी मदद से भी उसका दिन यादगार बन गया था। उसे आज समझ आ गया था की छोटी-सी मदद भी सही समय पे बहुत बड़ा काम कर देती है। क्योंकि उन्होंने उसकी मदद उस समय पर की जब उसके सामने कोई रास्ता नहीं था तभी रिक्शे वाला बोला-"लो भैया आ गया हंसराज कॉलेज"
अब अंकित और उसके सपनों
के बीच बस एक सड़क थी जो उसे सावधानी से पार करनी थी तो बस हमारा पक्षी उड़ चला। अचानक चलते-चलते उसके पाँव थम गये और फिर बाकी बच्चों को देख कर फिर चल पड़े। असल में मामला ये
था कि पिछले दो दिनों से भाई साहब को ये चिंता खाए जा रही थी कि बिना येलो कार्ड
के कॉलेज में प्रवेश नहीं मिलेगा जो इनके पास तो था नहीं।जिसके बारे में इन्हें
उन्हीं भैया ने बताया था जिन्होंने टाइम के बारे में बताया था। तो इस तरह अंकित
कॉलेज तो पहुंच गया पर दिन अभी बाकी था।
थोड़ी देर बाद अंकित कॉलेज स्टाफ रूम के बहार एक संशय के साथ मुंह लटकाए खड़ा था कि तभी एक आवाज़ आती है-
"एक्सक्यूज़ मी !" (ये आवाज़ एक लड़के की थी जो कद काठी में बिलकुल अंकित जैसा था।)"हेलो ! मेरा नाम न्यस्त है। क्या आपको पता है ? संस्कृत होनर्स न्यू एडमिशन कौन से रूम में बैठेंगे ?"
"नहीं ! मुझे भी वहीं जाना है। आप स्टाफ रूम से पता कर लीजिये"
और वो लड़का स्टाफ रूम के अन्दर चला गया। तभी अंकित के चेहरे से सारी परेशानी गायब हो गयी। शायद उसे भी अपनी समस्या का समाधान मिल गया था। वो स्टाफ रूम के सामने इसलिए खड़ा था ताकि वो अन्दर जाकर रूम पूछ सके पर इतनी हिम्मत नहीं हुई होगी। क्योंकि ये जनाब तो अपने रिश्तेदारों से भी बात करने में भी शर्माते हैं। थोड़ी देर में वो लड़का आया और उसने बताया रूम न. A-117 में जाना है ये रूम भी अंकित को नहीं पता था तो उसने लड़के के साथ जाने में ही समझदारी पायी। ये प्रथम तल पर था, कुछ सीढ़िया और थोड़ी दूरी तय करने के बाद वो रूम के सामने पहुंचे तो अन्दर एक अध्यापक जी बैठे थे उन दोनों ने उनसे अन्दर आने की अनुमति ली और अन्दर जाकर टेबल पर बैठ गये।
आज अध्यापक जी ने सभी का सामान्य परिचय लिया और सभी को महाविद्यालय भ्रमण करने की सलाह दी। अध्यापक जी के जाते ही आधे बच्चे उनके पीछे-पीछे कक्ष से बाहर निकल गये पर अभी भी बहुत से विद्यार्थी कक्ष में ही बैठे थे। अंकित को लग रहा था कि विद्यालय की तरह अगले अध्यापक आयेंगे और फिर वो भी कुछ बातें बताएंगे पर तभी उसके फ़ोन की घंटी बजी उसने देखा घर से मम्मी का फ़ोन था-
"हां मम्मी"
"बेटा पहुंच गया ?"
"जी।"
"कोई परेशानी तो नहीं हुई ?"
"नहीं, सब सही था।"
"अच्छा ! खाना खा लिया ?"
"अभी खा लूँगा थोड़ी देर में।"
"और घर कब तक आना होगा ?"
"देखता हूँ, अभी कुछ पता नहीं है छुट्टी कब होती है यहाँ।"
"ठीक है ! आराम से आना ।"
आज अंकित कक्षा की अंतिम यानी तीसरी टेबल पर बैठा था और उस दिन उस टेबल पर वो अकेला था वो बैठे बैठे आगे के बारे में सोच ही रहा था की तभी उसके सामने एक हाथ आया।
"हेलो भाई ! मैं अंकुश और आपका नाम ?"
"हेलो भाई ! मेरा नाम अंकित है।"
"कहां से हो आप ?" अंकुश ने पूछा।
"यहीं दिल्ली से ही।"
अंकुश ने दोबारा पूछा- "आप यहाँ फैमिली के साथ रहते हो।"
"जी भाई।"
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