कुछ अपनी(1)

भोर  की बेला, पूरा आसमान लालिमा से भरा हुआ, माहौल शांत है और पूरे मोहल्ले में सन्नाटा छाया है। पर अभी भी एक घर में अशांति कायम है। ये घर है अंकित का।
            अंकित एक सीधा-साधा होनहार  लड़का, पढ़ने में तेज और सीखने को हमेशा तैयार। तो मामला ये है कि आज जनाब के कॉलेज का पहला दिन है। तो यह पक्षी भी सुबह से ही अपने पंख सवारे बैठा है कि बस अब उड़ान भरे। अपने उन सपनो को पूरा करने के लिए जो पिछले तीन महीनो से उसके आँखों में झलक रहें हैं । 

समय 9:00 का है जो कि एक भैया से पता चला है जो दूसरे कॉलेज में पढ़ते हैं।
"मम्मी मेरी नयी वाली पेंट-शर्ट कहाँ है ?और वो काले जूते ?"
"कपड़े अलमारी में हैं और जूते टेबल के नीचे होंगे।"
"आरती ! मेरा बैग पैक कर दिया क्या ?"
"बैग पैक करने के लिए था ही क्या? एक रजिस्टर और दो पेन बैग में डाल दिए हैं।"
"राज ! ये जूते साफ़ कर दे भाई।"
 "ओह! 6 बज गये अब मुझे निकलना चाहिए।"
"पर बेटा अभी तो तीन घंटे हैं।"
"हाँ पापा ! पर कॉलेज पहुंचने में भी तो टाइम लगेगा ना। "
"कोई टाइम नहीं लगेगा 40 मिनट का रास्ता है। थोड़ी दूर तक मैं छोड़ दूंगा वहां से रिक्शा ले लेना।"
"बेटा टिफ़िन तो ले ले। "
"जल्दी करो मम्मी! "
"भैया! जूते साफ़ कर दिए।" 
"अरे हाँ यार तो जूते पहनना तो भूल ही गया था।"

तो बस पापा बाईक ले आये और सफ़र शुरू हुआ। गर्मियों की सर्द-सी हवा चेहरे से टकरा कर एक नया एहसास करा रही थी।आज पहली बार नहीं था जब वो पापा के साथ बाहर गया था पर आज वो सभी चीज़ों को अलग-सा महसूस कर रहा था । उस 35 मिनट के सफ़र में उसने कई अंतर्द्वंदों का सामना किया ।ये बहुत अनूठा एहसास था उस लड़के के लिए जो एक इसे पृष्ठभूमि से था जहाँ आजतक उसके कुटुंब में कोई भी कालेज नहीं गया था और पुरे गाँव में से किसी ने भी दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं लिया था। जिस समाज में उसके उम्र के बच्चे अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करना प्रारंभ कर देते हैं।
तो ये सफ़र खतम हुआ पापा ने उसे वहां उतारा जहाँ से आगे का सफ़र उसे खुद तय करना था।शायद ये पहली बार था जब वो कहीं जानें को अकेला निकला था। पहुंचने पर उसने कई रिक्शेवालों से अपने कॉलेज का नाम बता के वहां जाने के लिए पूछा तो सभी ने मना कर दिया।अब वो उसी जगह एक ख़ामोशी के साथ खड़ा हो गया कि तभी उसके कंधे पर एक हाथ आता है  एक आवाज़ के साथ "बेटा ! आपको हंसराज  कॉलेज जाना है?"
अंकित पीछे मुड़ा तो उसने देखा उसके सामने एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति साधारण सी पेंट शर्ट में खड़े थे। "जी अंकल जी" उसने कहा। "आ जाओ मेरे साथ" ये कहते हुए उन्होंने एक रिक्शे की तरफ इशारा किया  जिससे थोड़ी देर पहले अंकित जाने के लिए पूछ चूका था। फिर भी उलझे मन के साथ वो उस रिक्शे में बैठ गया उसमें सिर्फ वो दोनों ही बैठे थे। रिक्शे ने धीमी गति से चलना शुरु किया।

टिप्पणियाँ

Aditya Singh ने कहा…
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