उन्मुक्त
ये मेरी नींद बगावत कर रही है, वो मेरी शिकायत कर रही है। सुनकर हंस पड़ा खुदा भी, वो बद्दुआ में भी इनायत कर रही है। बड़ी उलझन में लगते हो, कुछ कहना चाहते हो ? मुझे बता ही दो अगर, आपे में रहना चाहते हो। वो चांद जिसे मैं बेहद चाहता था, उसकी चाहत में कोई कमी नहीं आई। पानी बरसा, खुशबू फूटी, पर कुछ पेड़ों में अब भी नमी नहीं आई। बहुत झेला है इसने, भली बातें कर रहा है। दिल की दरारों से होकर, उजाला बिखर रहा है। बड़े मुश्किल हालातों में हूं, मैं ये कैसे जज़्बातों में हूं। सबकी सुनें जा रहा हूं, और अपनी ही बातों में हूं। खुदा करे तो वो करें, जो मैं कहूं वो सो करें। बड़ा अकेला अकेला-सा लगता है, ये दुनिया नहीं मेला-सा लगता है। सब कहते हैं तुम्हारे लिए ही तो है, मगर उसके लिए धातु का ढेला-सा लगता है। हर रात घर से एक दुआ निकलती है, उस गांव के उस घर पर ठहरती है, जिसकी मुंडेर पर बैठी है मोहतरमा, उनकी जुल्फ़ बिन हवा के ही लहरती है। अजीब वक्त है, वक्त से गुजर जाता है, जब भी अच्छा हो नजरों से उतर जाता है। खुदा के वास्ते, खुद को भूल मत जाना, तुम यादों में आना पर याद मत आना।